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Tuesday, 11 January 2022

अब क्या किया जाए

डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति "रवीन्द्र की कविताएँ"।

भारतीय संगीत की संयुक्त विधा में गीतम महत्वपूर्ण है। इसलिये "गीतं च वाद्यं  द्वयं संगीतमुच्यते" कहा गया है। गायन व वाद्य वादन दोनों कलाओं का समावेश संगीत शब्द में माना गया है। दोनो स्वतंत्र कला होते हुए भी एक दूसरे की पूरक है और इनका समन्वित उपयोग दोनों श्रेष्ठ प्रभाव उत्पन्न करता है।
गीतम्:-
गन्ने से गन्ने का रस, रस से शकर फिर शकर से चाशनी। यह  क्रिया है। यह क्रिया- प्रक्रिया विज्ञान में 'एक्स्ट्रेक्शन', केमिस्ट्री में 'आसवन' आयुर्विज्ञान में 'अर्क' और बोलचाल की भाषा में 'निचोड़' है। कविता इसी तरह व्यापक विचारों और भावों का संघनन है। कविता कम शब्दों में कहा गया बड़ा वक्तव्य है। यही कविता पाठक तक पहुँचने पर इसके थोड़े शब्द अपने मूल स्रोत भावों और विचारों के व्यापक स्वरूप और भावों की अभिव्यक्ति को पुनर्स्थापित करने में सफल होनी चाहिये: कविता तभी सार्थक होती ही। बहुत थोड़े शब्दों में कही गई उनकी कविता में यह शब्दों की कंजूसी नही बल्कि वह संतृप्त विलयन है जैसे उजाला नील की चार बूँद बाल्टी भर सफेद कपड़ों को और झकास सफेद कर देती है। जैसे पेड़ के फल से बीज उत्पन्न होता है यह संघनन है और फिर इस बीज से पुनः पेड़ प्राप्त हो जाना व्यापक विस्तार है ठीक वैसे ही भावों-विचारों के शाब्दिक संघनन से उनकी कविता का भावनात्मक विस्तार होना संभव है। डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की कविताएँ भावों-विचारों का संघनन है लेकिन शब्द इतने व्यावहारिक और सहज है कि वे मूल विचारों और भावों को सहज रूप से पुनर्स्थापित करने में सक्षम है। यह संक्षेपिका उनकी चार कृतियाँ "कल शाम", "मैंने पुकारा", "अब क्या किया जाय" और "बस, एक बार" के संदर्भ में है।
वाद्यंः-
संगीत भारतीय संस्कृति की आत्मा मानी जाती है। वैदिक काल में अध्यात्मिक संगीत को मार्गी तथा लोक संगीत को 'देशी' कहा जाता था। कालांतर में यही शास्त्रीय और लोक संगीत के रूप में दिखता है।
राग सुरों के आरोहण और अवतरण का ऐसा नियम है जिससे संगीत की रचना की जाती है।
राग' शब्द संस्कृत की 'रंज्' धातु से बना है। रंज् का अर्थ है रंगना। जिस तरह एक चित्रकार तस्वीर में रंग भरकर उसे सुंदर बनाता है, उसी तरह संगीतज्ञ मन और शरीर को संगीत के सुरों से रंगता ही तो हैं। रंग में रंग जाना मुहावरे का अर्थ ही है कि सब कुछ भुलाकर मगन हो जाना या लीन हो जाना। संगीत का भी यही असर होता है। जो रचना मनुष्य के मन को आनंद के रंग से रंग दे वही राग कहलाती है। हर राग का अपना एक रूप, एक व्यक्तित्व होता है जो उसमें लगने वाले स्वरों और लय पर निर्भर करता है।
अब क्या किया जाए?
साधु खड़ा द्वार पर
भिक्षा की गुहार लगाए
घर में नहीं है एक मुट्ठी सीधा,
अब क्या किया जाए?

विचारों की बादल
घुमड़-घुमड़ कर छाए
लिखने को कुछ उपलब्ध नहीं है,
अब क्या किया जाए?

असामाजिक तत्वों की टुल्लर
चंदे की आवाज लगाए
आज जेब में केवल हजार के नोट,
अब क्या किया जाए?

नव युवकों की टोली
होली के चंदे की पुकार लगाए,
याद करूं मोहल्ले की हुड़दंग,
अब क्या किया जाए?

एक अपाहिज
दुहाई दे, दरकार लगाए
पास में एक सिक्का नहीं है
अब क्या किया जाए?

एक अपंग
भूखा हूं, ऐसी गुहार करे
मैं स्वयं कल से भूखा हूं,
अब क्या किया जाए?

एक संत
गूढ़ रहस्य की बात बताएं
मन मेरा स्थिर नहीं है
अब क्या किया जाए?

एक दड़बे में
पक्षी तड़पे
दानों को मोहताज हुआ है
अब क्या किया जाए?

मन मंदिर में
बसती एक मोहक सूरत
पूजा की दरकार नहीं है
अब क्या किया जाए?
      डॉ रवीन्द्र पहलवान

यह प्रश्न कवि का किसी और से नहीं वरन् स्वयं से है। प्रश्न केवल प्रश्न नहीं है वह एक ऐसे मनोभाव को दर्शाता है जो सापेक्ष है लेकिन साथ ही वह सार्थक है।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌।। श्रीमद्भगवद्गीता।।17/20।।
भावार्थ : दान देना ही कर्तव्य है - ऐसे मनोभाव से उपयुक्त दान किसी देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो उस वस्तु द्वारा पात्र प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य दिया जाता है। जैसे भूखे, अनाथ, दुःखी और असमर्थ अथवा भिक्षुक आदि को अन्न, वस्त्र आदि वस्तु द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र व्यक्ति को दिया जाय। जो दान  प्रत्युपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहा गया है। तात्पर्य यह है कि मनोभाव इन्सान में होना चाहिये "मैं किसी जरूरतमन्द की मदद करूँ।"
कविता इसी मनोभाव से प्रारंभ होती है। कवि के पास इतने साधन संसाधन का अभाव है पर हर जरूरतमन्द की जरूरत पूरी करना चाहता है।
"सीधा" एक बोलचाल का शब्द है जिसका तात्पर्य रसोई के कच्चे सामान से है जो किसी को दिया जाय तो उससे पूरा भोजन तैयार हो सके। कवि का सामर्थ्य नही है पर मन्तव्य दान देने का है जो परम सात्विक भाव है।
कबीर ने यही बात अपने तरीके से कही है--
साईं एतना दीजिये जा में कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय।।
जेब में एक हजार के नोट से संकेत है कि वह धन जो अब मेरे अथवा किसी ओर के काम का नही है। अन्तिम पद में उस प्रतिमा और प्रतिमान का उल्लेख है जो मोहिनी स्वरूप है जिसकी पूजा की आवश्यकता नहीं है। दबी जुबान यह संकेत है कि उससे बस प्रेम किया जाए।

कविता को मधुर स्वर कुशल संगीतकार पण्डित मोहन शर्मा ने दिया है। धुन राग "पहाड़ी" पर आधारित है। शब्दों और स्वरों के संयोजन ने रचना को रसमय बना दिया है।

डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान एक मूर्धन्य कवि, हिन्दी साहित्य के उद्भट विद्वान एवं कुशल संपादक हैं। आपकी   काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी है। इन कविताओं में अधिकतर छोटी छोटी कविताएँ हैं जिन्हें हम "मिनी कविता" एवं "माइक्रो कविता" कह सकते हैं। शाब्दिक- परिमाण में तो वे छोटी हैं पर भावात्मक-परिणाम में बड़ी।

कहते हैं पूरा जगत वस्तुतः संगीतमय है। पृथ्वी एक नियमित लय में घूमती है। पत्तों के हिलने-डुलने में भी एक लय और ताल होते हैं। मनुष्य का हृदय एक समान लय में धड़कता है। ख़ुशी में मनुष्य गुनगुनाता है और दुःख को संगीत कम करने की क्षमता रखता है। कहने है कि संगीत हमारी हर सांस में बसा हुआ है। प्रस्तुत कविताओं में शास्त्रीय संगीत के विविध रागों और जीवन के तारतम्य में इसे एक काव्यात्मक लय के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश है। पण्डित मोहन शर्मा स्वयं एक कवि हैं और साथ ही शास्त्रीय संगीत के सुयोग्य साधक भी हैं।

रामनारायण सोनी

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