डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान
मेरी नजर इनकी कुछ रचनाओं पर ठहर गयी। डॉ. रवीन्द्र नारायण पहलवान की पकी उम्र में जीवन की अनुभूतियाँ, संकल्पों और विकल्पों की छननी और उनमें से छन कर आते हुए परिपक्व जीवन सूत्र को अनवाइन के अर्क सा स्पष्ट देखा जा सकता है। यह चिंतन एक गहराई को स्पर्श करता है तो लगता है जैसे यह चरित्र के नव सृजन की एक दृढ़ नींव को भरने की तैयारी चल है। डॉ. रवीन्द्र की रचनाओं में यह भाव प्रचुरता से पाया जाना अपने आप में लोमहर्षक है। इनकी रचनाओं के केंद्रीय भाव इतना सहज रूप से शब्दों के सरोवर से समझ की सतह पर तैर कर आ जाता है कि देखते ही बनता है।
एक तरफ तो उसमें उभरते हुए भाव पक्ष हैं वहीं उनकी दूरदर्शिता उन विचारों की सामान्य सीमाओं से परे जाने का शब्द सामर्थ्य रखती है। इन बातों के समन्वय से ही कविताओं में गढ़े गये बिम्ब बाहर से तो कुटिया जैसे पर अन्दर से राजप्रासाद से लगते हैं। कविता कहीं भी अपने केन्द्रीय भाव से भटकती नहीं है। इस दृश्यमान शिल्प से पाठक सहज ही जुड़ जाता है और शीघ्र ही इसे आत्मसात करने लगता है। उसकी शब्दिता उतना ही श्रंगार धारण कर लेती है । कविता का तन शब्दों का और भाव उसकी आत्मा है। सहजता, सरलता और सुगमता उसके नैसर्गिक श्रृंगार हैं। आइये! उनकी कुछेक कृतियों को हम यहाँ सहेजने और समझने का प्रयास करते हैं।
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment